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प्रायद्वीपीय पठार praydwipiya pathar




  • यह गोडवाना लैण्ड का भाग है, जो आर्कियन काल की चट्टानो से निर्मित
    है। यह भारतीय उप-महाद्वीप का सबसे प्राचीनतम भू-खण्ड है। यह एक त्रिभुजाकार आकृती
    में विस्तृत है जिसका आधार उतर में तथा ढाल पूर्व में है।
  •  उतर से दक्षिण दिशा में
    इसकी लम्बाई 1600 कि.मी. तथा पूर्व से पश्चिम दिशा में इसकी चैड़ाई 1400 कि.मी. है।
    इसका विस्तार 16 लाख वर्ग कि.मी. क्षेत्र में है। प्रायद्वीपीय भारत की औसत उंचाई
    600 से 900 मी.
    है। इसके पश्चिमी भागो के समतल मैदानो में काली लैटेराइट मिट्टी मिलती
    है।
  •  इसकी नर्मदा व ताप्ती नदी ढाल के विपरित बहती है। पठारो का निर्माण ज्वालामुखी
    के दरारी उद्गार से होता है। सामान्यतः पठारो से हमें काली मिट्टी मिलतीहै। पामीर
    का पठार विश्व का सबसे उंचा पठार है। इसलिए इसके विश्व की छत कहा जाता है। 
  • तरफ कुनलुन की पहाड़ीयां स्थित है, जबकि इसके बायीं तरफ हिन्दुकुश पर्वत
    स्थित है। हिन्दुकुश पर्वत में स्थित खैबर दर्रे से भारत में अरब
    , तुर्क व मुस्लिम आक्रांता आए थे।
    कराकोरम को एशिया की रीढ की हड्डी कहा जाता है। अरावली
    , विन्ध्यांचल,सतपुड़ा, भारनेर, कैमुर, राजमहल तथा शिलांग की पहाड़ियाँ इसके
    उतरी भाग में स्थित है।

भारत के पठारी भू भाग को मुख्यतः निम्न भागो
में बांटा गया है-

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मध्यवर्ती उच्च भूमियाँ madya varti ucch bhumi

अरावली श्रेणी aravali sreni

अरावली श्रेणीयह पालनपुर (गुजरात) से राजस्थान होकर
दिल्ली में रायसीना की पहाड़ियों तक लगभग 
800 कि.मी. तक विस्तृत है। रायसीना की पहाड़ीयों
पर भारत सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता वाली सरकारी इमारतो को बनाया गया है। इसका
सर्वोच्च शिखर गुरूशिखर (1722 मी.) है। इसका निर्माण प्री कैम्ब्रियन युग में हुआ
है। इसके पूर्व में बनास
, माही व चम्बल द्वारा मैदानो का निर्माण हुआ है।

मालवा का पठार malva ka pathar –

 यह राजस्थान व मध्यप्रदेश की सीमा
पर अरावली व विन्ध्यांचल श्रंखलाओ के मध्य में 
स्थित है तथा चम्बल के बीहड़ो के लिए
जाना जाता है। इसके उतर में ग्वालियर की पहाड़ियां है। यह भारत का सर्वाधिक अपरदित
क्षेत्र है।

बुदेंलखण्ड का पठार bundelkhand ka pathar

 यह पठार मध्य प्रदेश के ग्वालियर के पठार से लेकर विंध्यांचल पर्वत के बीच स्थित
है। इसमें ग्रेनाइट व नीस की चट्टाने मुख्य रूप से पाई जाती है।

बघेलखण्ड का पठार bhagelkand ka pathar

 यह छतीसगढ के मैकाल
की पहाड़ीयों के पूर्व में स्थित है। यह सोन व महानदी के बीच जल विभाजक का कार्य
करता है।

छोटा नागपुर का पहाड़ chota nagpur ka apthar

 झारखण्ड में
स्थित इस पठार को भारत का रूर/रूहर कहा जाता है। इसके उतर में राजमहल की पहाड़ीयां
स्थित है। इसके दक्षिण से महानदी बहती है। इस पठार के बीचो बीच से दामोदर नदी बहती
है
, जो इसे दो भागो
में विभाजित करती है। यह पठार बिटुमिनस कोयले के लिए प्रसिद्ध है। 

महानदी, सोन, स्वर्णरेखा व दामोदर इस पठार की प्रमुख नदियाँ है। राजमहल की पहाड़ियां
इसकी उतरी सीमा बनाती है। इसमें 
हजारीबाग का पठार, रांची का पठार तथा कोडरमा का पठार
शामिल है। इस पठार में तीव्र ढाल पाए जाने के कारण इसे अग्रगम्भीर पठार की संज्ञा
दी गई है। गोंडवाना क्रम की चट्टानो से निर्मित होने के कारण इस पठार को खनिजो का
भण्डार ग्रह भी कहा जाता है।

शिलांग का पठार shilang ka pathar- 

यह मेघालय में स्थित है। इसमें मासिनराम व चेरापुंजी नामक स्थान है। यह एक समतल
भूमि है जो भ्रंशन के कारण भारतीय प्रायद्वीप से माल्दा गैप द्वारा पृथक हो गई है।
इसके पश्चिमी सिरे पर गारो की पहाड़ियां
, मध्य में खासी, जयंतियां
और पूर्व में मिकिर की पहाड़ियां स्थित है।




दक्षिणी पठारी भूमि dhakshini pathari bhumi

दक्कन का पठार deccan ka pathar – 

यह ताप्ती नदी के दक्षिण में स्थित है। यह महाराष्ट्र में त्रिभुजाकार आकृति में 7
लाख वर्ग कि.मी. क्षेत्र में विस्तृत है। इसका निर्माण क्रिटेशियस युग में दरारी
ज्वालामुखी से हुआ है। यहां पर स्थित लोनार झील एक क्रेटर झील है। यहां पर लावे से
काली मिट्टी का निर्माण हुआ है।तेलंगाना का पठार – यह गोदावरी नदी द्वारा दो भागो
में विभाजित है। यहां पर उर्मिल के मैदान पाए जाते है। यह प्रायद्वीपीय पठार का
समतलीय क्षेत्र है
, जो
रायलसीमा पठार के नाम से जाना जाता है।

मैरुर/कर्नाटक का पठार karnataka ka pathar – 

इसके दक्षिणी भाग को मैसुर का पठार कहा जाता है। यह कर्नाटक से केरल तक विस्तृत
है। इसमें कृष्णा
, कावेरी
व तुंगभद्रा नदी प्रवाहित होती है। मलनरद यहां का पहाड़ी प्रदेश है। यहां बाबा बूदन
की पहाड़ी स्थित है जो लौह अयस्क के लिए प्रसिद्ध है। यह क्षेत्र कहवा उत्पादन
कीदृष्टि से महत्वपूर्ण है। मानसून पूर्व होने वाली बरसात चेरी ब्लोसम हिलाती है
, जिसे फुलो की वर्षा भी कहा जाता है। यह
वर्षा कहवा के लिए वरदान होती है।

प्रायद्वीपीय भारत के पर्वतीय प्रदेश praydwipiya bharat ke parvatiya pradesh

सतपुड़ा पर्वत vindyachal parvat – 

सतपुड़ा पर्वत इसकी शुरूआत गुजरात से होती है परन्तु इसका मूल विस्तार महाराष्ट्र से झारखण्ड के मध्य
4 पहाड़ीयों की श्रंखला (विंध्यांचल
,
भण्डारै, कैमुर
व पारसनाथ) के रूप में स्थित है। यह पर्वत श्रंखला भारत को दो बराबर भागो में
बांटती है। यह भारत की दो प्राचीन आर्य व अनार्य संस्कृति को अलग करती है।

सतपुड़ा पर्वत satpudha parvat 

सतपुड़ा पर्वत यह मध्यप्रदेश से छतीसगढ के मध्य तीन पहाड़ीयों के रूप में स्थित है। इन तीनो
पहाड़ीयों 
को सतपुड़ा, महादेव जी व मैकाले की पहाड़ीयों के नाम
से जाना जाता है। महादेव जी की पहाड़ीयो की सबसे उंची चोटी को धूपगढ कहा जाता है।
पंचमढी मध्य भारत का स्वास्थय वर्धक स्थल है। मैकाले की पहाड़ी की सबसे उंची चोटी
अमरकंटक है। अमरकंटक से नर्मदा व सोन नदी निकलती है।

सह्याद्रि पर्वत sahyatri parvat– 

सह्याद्रि पर्वतइसका विस्तार ताप्ती नदी से केरल में कन्याकुमारी के कुमारी अन्तरीप तक लगभग 1600 किमी तक है। यह हिमालय के बाद भारत की
सबसे  लम्बी पर्वत श्रंखला है। इसकी औसत
उंचाई 1200 मीटर है। 160 चैनल इसके 2 भागो में बांटता है। इसका उतरी भाग उतरी
सह्याद्री व दक्षिणी भागदक्षिणी सह्याद्री कहलाता है। उतरी सह्याद्री का निर्माण
बेसाल्ट लावे से हुआ है। इसकी सबसे उंची चोटी कालसुबोई (1646 मी.) है। दक्षिणी सह्याद्री
का निर्माण ग्रेनाईट व नीस की चट्टानो से हुआ है। इसकी सबसे उंची चोटी कुद्रेमुख
(1892 मी
,) है।

थालघाट दर्रा thalghat darra-

थालघाट दर्रा (मुम्बई) मुम्बई को नासिक
व कोलकता से जोड़ता है। भोरघाट दर्रा (मुम्बई) मुम्बई को पुणे व 
चेन्नई से जोड़ता है। पालघाट दर्रा
कोच्चि को चेन्नई से जोड़ता है। पालघाट दर्रा दक्षिणी सह्याद्री का एक भाग है।

प्रायद्विपिय पठार का पूर्वी घाट praydwipiy pathar ka purvi ghat

प्रायद्विपिय पठार का पूर्वी घाट यह महानदी कीघाटीयों से नीलगिरी की पहाड़ियों तक विस्तृत है। इस पर्वत श्रेणी को
नदियों द्वारा अनेक स्थानो पर काट दिया गया है। इस कारण यह अलग अलग पहाड़ियों के
रूप में मिलती है। अरमाकोण्डा पर्वत/विशाखपतनम चोटी- 1680 मीटर (उड़िसा)
, शेवराय (तमिलनाडू), जवादी, नल्लामलाई, पालकोंडा
व महेन्द्रगिरि पर्वत -1502 मीटर (आन्ध्र प्रदेश) इसकेप्रमुख पर्वत है।

नीलगिरि की पहाडि़या nilgiri ki pahadiya-

नीलगिरि की पहाडि़या ये कर्नाटक, केरल
व तमिलनाडू में विस्तृत है। इनकी सबसे उंची चोटी डोडाबेटा (2637 मी.) है। डोडाबेटा
प्रायद्वीपीय भारत की दुसरी सबसे उंची चोटी है। नीलगिरि की पहाड़ीयों को पूर्वी व
पश्चिमी घाट का जंक्शन कहा जाता है। मोपला आन्दोलन नील की खेती करने वाले किसानो द्वारा
केरल में किया गया था। उटी/उटकंमक(तमिलनाडू) द. भारत का स्वास्थ वर्धक स्थल है।

अन्नामलाई की पहाडी़यां annamalai pahadiya-

अन्नामलाई की पहाडी़यांअर्नागुडी़
इसकी सबसे उंची चोटी है। जो 2695 मी. उंची है। यह प्रायद्वीपीय 
भारत की सबसे उंची चोटी है। केरल में
अन्नामलाई की पहाड़ीयों को इलायची की पहाड़ीयां कहा जाता है। तमिलनाडू में अन्नामलाई
की पहाड़ीयों को पालनी की पहाड़ीयां कहा जाता है।




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